Thursday, 17 September 2015

खजूर

परिचय :

खजूर के पेड़ पतले व बहुत ऊंचे होते हैं। खजूर के पेड़ नारियल के पेड़ के समान होते हैं। यह 30 से 50 फुट ऊंचे होते हैं और इसके तने तंतुओं से बने 3 फुट लम्बे मटमैले होते हैं। खजूर के पत्ते नोकदार कटे-कटे से 10 से 15 फुट तक लम्बे होते हैं। इसके फूल खुशबूदार और छोटे होते हैं। फल छोटे-छोटे गुच्छों में होते हैं और इसके अन्दर बीज सख्त व दोनों सिरों से गोल होते हैं।
खजूर 2 प्रकार के होते हैं- खजूर और पिण्ड खजूर। पिण्ड खजूर का फल खजूर के फल से अधिक गूदेदार व काफी बड़ा होता है। यही फल सूखने पर छुहारा कहलाता है। खजूर एक पौष्टिक मेवा भी है। खजूर के पेड़ के ताजे रस को नीरा और बासी को ताड़ी कहते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार : खजूर स्वादिष्ट, पौष्टिक, मीठा, शीतल, तृप्तिकारक (इच्छा को शांत करने वाला), स्निग्ध, वात, पित्त और कफ को दूर करने वाला होता है। यह टी.बी, रक्त पित्त, सूजन एवं फेफड़ों की सूजन के लिए लाभकारी होता है। यह शरीर एवं नाड़ी को शक्तिशाली बनाता है। सिर दर्द, बेहोशी, कमजोरी, भ्रम, पेट दर्द, शराब के दोषों को दूर करने के लिए इसका प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है। यह दमा, खांसी, बुखार, मूत्र रोग के लिए भी लाभकारी है।
यूनानी चिकित्सकों के अनुसार : खजूर गर्म व तर होता है। यह कमजोर जिगर को मजबूत बनाने वाला, थकावट को दूर करने वाला, शरीर को मोटा बनाने वाला, धातुदोष को दूर करने वाला, लकवा और कमर के दर्द को समाप्त करने वाला होता है। यह कामोत्तेजक होता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार : खजूर का रसायनिक अध्ययन करने पर पता चला है कि इसमें विभिन्न तत्त्व होते हैं-
तत्त्व मात्रा
चीनी 67.3 प्रतिशत
प्रोटीन 5.0
वसा 2.0
खनिज प्रदार्थ 1.3
कैल्शियम थोड़ी मात्रा
लौहा थोड़ी मात्रा
फास्फोरस थोड़ी मात्रा
विटामिन ए, बी थोड़ी मात्रा
पानी 21.1 प्रतिशत
विभिन्न भाषाओं में खजूर के नाम :
संस्कृत खर्जूर।
हिन्दी खजूर, छुहारा, पिडं खजूर।
अंग्रेजी डेट।
लैटिन फिनिक्स डेक्टीलीफेरा।
मराठी खारिक।
गुजराती खोरेक।
बंगाली खेजूर।
रंग : खजूर का रंग काला व लाल होता है।
स्वाद : इसका स्वाद मीठा और वाकस होता है।
स्वरूप : खजूर दो प्रकार के होते हैं- खजूर और पिण्ड खजूर। खजूर का पेड़ बड़ा होता है व नारियल के पेड़ के समान होता है। इसमें पीले व हल्के लाल रंग के फल लगते हैं। पत्ते नोकदार होते हैं जो पहले हरे, फिर पीले व पकने के बाद लाल हो जाते हैं।
प्रकृति : खजूर शीतल और ठंडा होता है।
हानिकारक : खजूर का अधिक उपयोग करना खून को जला देता है।
दोषों को दूर करने वाला : खजूर के साथ >बादाम खाने से खजूर में मौजूद दोष दूर होते हैं।

तुलना : खजूर की तुलना किशमिश से की जा सकती है।

अंकुरित गेहूं-Wheat germ


सेहत के साथी हैं गेहूं के अंकुरित दाने
 
अंकुरित अनाज सेहत के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। अब गेहूं को ही ले लीजिए। गेहूं के आटे से बनी चपाती तो सबसे सहज और पौष्टिक खाद्य है ही। अंकुरित गेहूं भी आपको ढेर सारे विटामिन्स तथा पौष्टिक तत्व दे सकते हैं। गुणों से भरपूर होने के साथ ही ये आपके बजट में भी आसानी से समा सकता है। अंकुरित गेहूं शरीर के लिए शक्तिवर्धक टॉनिक की तरह ही है।
 

अंकुर उगे हुए गेहूं में विटामिन-ई भरपूर मात्रा में होता है। शरीर की उर्वरक क्षमता बढ़ाने के लिए विटामिन-ई एक आवश्यक पोषक तत्व है। यही नहीं, इस तरह के गेहूं के सेवन से त्वचा और बाल भी चमकदार बने रहते हैं। किडनी, ग्रंथियों, तंत्रिका तंत्र की मजबूत तथा नई रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी इससे मदद मिलती है। अंकुरित गेहुं में मौजूद तत्व शरीर से अतिरिक्त वसा का भी शोषण कर लेते हैं।
इतना ही नहीं, अंकुरित गेहूं खाने से शरीर का मेटाबॉलिज्म रेट बढ़ता है। यह शरीर में बनने वाले विषैले तत्वों को भी निष्प्रभावी कर, रक्त को शुद्घ करता है। अंकुरित गेहूं के दानों को चबाकर खाने से शरीर की कोशिकाएं शुद्घ होती हैं और इससे नई कोशिकाओं के निर्माण में भी मदद मिलती है। अंकुरित गेहूं में उपस्थित फाइबर के कारण इसके नियमित सेवन से पाचन क्रिया भी सुचारु रहती है। अतः जिन लोगों को पाचन संबंधी समस्याएं हो उनके लिए भी अंकुरित गेहूं का सेवन फायदेमंद है।
 
कैसे करें अंकुरित
गेहूं अंकुरित करने के लिए अच्छी गुणवत्ता का गेहूं लें। गेहूं को साफ करके 6-12 घंटे के लिए पानी में भिगो दें। इन गेहूं को दिन में तीन बार पानी से धोएं। अब गेहूं को स्प्राउट मेकर में या कपड़े में बांधकर रख दें। अंकुरित होने पर मनचाहे तरीके से इनका प्रयोग करें। बच्चों के लिए भी आप इनसे पराठे, स्टफ्ड पूरी, सैंडविच जैसी चीजें बना सकती हैं। वहीं डाइट कांशस लोग इसे सिंपल तरीके से नीबू तथा हल्के मसाले के साथ खा सकते हैं।
 
अंकुरित गेहूं
389 कैलोरी 5 व्यक्त्तियों के लिए।
सामग्री
 
अंकुरित गेहूं 100 ग्राम
पार्सले 50 ग्राम कटा हुआ
नींबू और नमक स्वाद अनुसार
नारियल कद्दूकस किया हुआ 1 बड़ा चम्मच
 

पपीता(Papaya)

पपीता फरवरी-मार्च एवं मई से अक्तूबर तक के महीनों में बहुतायत से पाया जानेवाला फल है।
कच्चे पपीते के दूध में पेपेइन नामक पाचक रस (Enzymes) होता है। ऐसा आज के वैज्ञानिक कहते हैं। किंतु कच्चे पपीते का दूध इतना अधिक गर्म होता है कि अगर उसे गर्भवती स्त्री खाये तो उसको गर्भस्राव की संभावना रहती है और ब्रह्मचारी खाये तो वीर्यनाश की संभावना रहती है।
पके हुए पपीते स्वाद में मधुर, रुचिकारक, पित्तदोषनाशक, पचने में भारी, गुण में गरम, स्निग्धतावर्धक, दस्त साफ लाने वाले, वीर्यवर्धक, हृदय के लिए हितकारी, वायुदोषनाशक, मूत्र साफ लानेवाले तथा पागलपन, यकृतवृद्धि, तिल्लीवृद्धि, अग्निमांद्य, आँतों के कृमि एवं उच्च रक्तचाप आदि रोगों को मिटाने में मददरूप होते हैं।
आधुनिक विज्ञान के मतानुसार पपीते में विटामिन ए पर्याप्त मात्रा में होता है। इसका सेवन शारीरिक वृद्धि एवं आरोग्यता की रक्षा करता है।
पके हुए पपीते में विटामिन सी की भी अच्छी मात्रा होती है। इसके सेवन से सूख रोग (स्कर्वी) मिटता है। बवासीर, कब्जियत, क्षयरोग, कैंसर, अल्सर, अम्लपित्त, मासिकस्राव की अनियमितता, मधुमेह, अस्थि-क्षय (Bone T.B.) आदि रोगों में इसके सेवन से लाभ होता है।
 
लिटन बर्नार्ड नामक एक डॉक्टर का मतव्य है कि प्रतिजैविक (एन्टीबायोटिक) दवाएँ लेने से आँतों में रहने वाले शरीर के मित्र जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, जबकि पपीते का रस लेने से उन लाभकर्ता जीवाणुओं की पुनः वृद्धि होती है।
पपीते को शहद के साथ खाने से पोटैशियम तथा विटामिन ए, बी, सी की कमी दूर होती है।
पपीता खाने के बाद अजवाइन चबाने अथवा उसका चूर्ण लेने से फोड़े-फुंसी, पसीने की दुर्गन्ध, अजीर्ण के दस्त एवं पेट के कृमि आदि का नाश होता है। इससे शरीर निरोगी, पुष्ट एवं फुर्तीला बनता है।


औषधि-प्रयोगः
बालकों का अल्पविकासः नाटे, अविकसित एवं दुबले-पतले बालकों को रोज उचित मात्रा में पका हुआ पपीता खिलाने से उनकी लम्बाई बढ़ती है, शरीर मजबूत एवं तंदरुस्त बनता है।

मंदाग्नि, अजीर्णः रोज सुबह खाली पेट पपीते की फाँक पर नींबू, नमक एवं काली मिर्च अथवा संतकृपा चूर्ण डालकर खाने से मंदाग्नि, अरुचि तथा अजीर्ण मिटता है।

सीताफल(Custard Apple)

अगस्त से नवम्बर के आस-पास अर्थात् आश्विन से माघ मास के बीच आने वाला सीताफल, एक स्वादिष्ट फल है।

आयुर्वेद के मतानुसार सीताफल शीतल, पित्तशामक, कफ एवं वीर्यवर्धक, तृषाशामक, पौष्टिक, तृप्तिकर्ता, मांस एवं रक्तवर्धक, उलटी बंद करने वाला, बलवर्धक, वातदोषशामक एवं हृदय के लिए हितकर है।
आधुनिक विज्ञान के मतानुसार सीताफल में कैल्शियम, लौह तत्त्व, फासफोरस, विटामिन – थायमीन, राईबोफ्लेविन एवं विटामिन सी आदि अच्छे प्रमाण में होते हैं।
जिन लोगों की प्रकृति गर्म अर्थात् पित्तप्रधान है उनके लिए सीताफल अमृत के समान गुणकारी है।
औषधी प्रयोगः
हृदय पुष्टिः जिन लोगों का हृदय कमजोर हो, हृदय का स्पंदन खूब ज्यादा हो, घबराहट होती हो, उच्च रक्तचाप हो ऐसे रोगियों के लिए भी सीताफल का सेवन लाभप्रद है। ऐसे रोगी सीताफल की ऋतु में उसका नियमित सेवन करें तो उनका हृदय मजबूत एवं क्रियाशील बनता है।
भस्मक (भूख शांत न होना)- जिन्हें खूब भूख लगती हो, आहार लेने के उपरांत भी भूख शांत न होती हो – ऐसे भस्मक रोग में भी सीताफल का सेवन लाभदायक है।

सावधानीः सीताफल गुण में अत्यधिक ठंडा होने के कारण ज्यादा खाने से सर्दी होती है। कइयों को ठंड लगकर बुखार आने लगता है, अतः जिनकी कफ-सर्दी की तासीर हो वे सीताफल का सेवन न करें। जिनकी पाचनशक्ति मंद हो, बैठे रहने का कार्य करते हों, उन्हें सीताफल का सेवन बहुत सोच-समझकर सावधानी से करना चाहिए, अन्यथा लाभ के बदले नुक्सान होता है।

शीत ऋतुचर्या

शीत ऋतु के अंतर्गत हेमंत और शिशिर ऋतु आते हैं। यह ऋतु विसर्गकाल अर्थात् दक्षिणायन का अंतकाल कहलाती है। इस काल में चन्द्रमा की शक्ति सूर्य की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती है। इसलिए इस ऋतु में औषधियाँ, वृक्ष, पृथ्वी की पौष्टिकता में भरपूर वृद्धि होती है व जीव जंतु भी पुष्ट होते हैं। इस ऋतु में शरीर में कफ का संचय होता है तथा पित्तदोष का नाश होता है।
शीत ऋतु में स्वाभाविक रूप से जठराग्नि तीव्र रहती है, अतः पाचन शक्ति प्रबल रहती है। ऐसा इसलिए होता है कि हमारे शरीर की त्वचा पर ठंडी हवा और हवा और ठंडे वातावरण का प्रभाव बारंबार पड़ते रहने से शरीर के अंदर की उष्णता बाहर नहीं निकल पाती और अंदर ही अंदर इकट्ठी होकर जठराग्नि को प्रबल करती है। अतः इस समय लिया गया पौष्टिक और बलवर्धक आहार वर्षभर शरीर को तेज, बल और पुष्टि प्रदान करता है। इस ऋतु में एक स्वस्थ व्यक्ति को अपनी सेहत की तंदरूस्ती के लिए किस प्रकार का आहार लेना चाहिए ? शरीर की रक्षा कैसे करनी चाहिए ? आइये, उसे हम जानें-
शीत ऋतु में खारा तथा मधु रसप्रधान आहार लेना चाहिए।
 
पचने में भारी, पौष्टिकता से भरपूर, गरम व स्निग्ध प्रकृति के घी से बने पदार्थों का यथायोग्य सेवन करना चाहिए।
वर्षभर शरीर की स्वास्थ्य-रक्षा हेतु शक्ति का भंडार एकत्रित करने के लिए उड़दपाक, सालमपाक, सोंठपाक जैसे वाजीकारक पदार्थों अथवा च्यवनप्राश आदि का उपयोग करना चाहिए।
मौसमी फल व शाक, दूध, रबड़ी, घी, मक्खन, मट्ठा, शहद, उड़द, खजूर, तिल, खोपरा, मेथी, पीपर, सूखा मेवा तथा चरबी बढ़ाने वाले अन्य पौष्टिक पदार्थ इस ऋतु में सेवन योग्य माने जाते हैं। प्रातः सेवन हेतु रात को भिगोये हुए कच्चे चने (खूब चबा-चबाकर खाये), मूँगफली, गुड़, गाजर, केला, शकरकंद, सिंघाड़ा, आँवला आदि कम खर्च में सेवन किये जाने वाले पौष्टिक पदार्थ हैं।
इस ऋतु में बर्फ अथवा बर्फ का फ्रिज का पानी, रूखे-सूखे, कसैले, तीखे तथा कड़वे रसप्रधान द्रव्यों, वातकारक और बासी पदार्थ, एवं जो पदार्थ आपकी प्रकृति के अनुकूल नहीं हों, उनका सेवन न करें। शीत प्रकृति के पदार्थों का अति सेवन न करें। हलका भोजन भी निषिद्ध है।
इन दिनों में खटाई का अधिक प्रयोग न करें, जिससे कफ का प्रयोग न हो और खाँसी, श्वास (दमा), नजला, जुकाम आदि व्याधियाँ न हों। ताजा दही, छाछ, नींबू आदि का सेवन कर सकते हैं। भूख को मारना या समय पर भोजन न करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। क्योंकि चरक संहिता का कहना है कि शीतकाल में अग्नि के प्रबल होने पर उसके बल के अनुसार पौष्टिक और भारी आहारूपी ईंधन नहीं मिलने पर यह बढ़ी हुई अग्नि शरीर में उत्पन्न धातु (रस) को जलाने लगती है और वात कुपित होने लगता है। अतः उपवास भी अधिक नहीं करने चाहिए।
शरीर को ठंडी हवा के सम्पर्क में अधिक देर तक न आने दें।
 
प्रतिदिन प्रातःकाल दौड़ लगाना, शुद्ध वायुसेवन हेतु भ्रमण, शरीर की तेलमालिश, व्यायाम, कसरत व योगासन करने चाहिए।
जिनकी तासीर ठंडी हो, वे इस ऋतु में गुनगुने गर्म जल से स्नान करें। अधिक गर्म जल का प्रयोग न करें। हाथ-पैर धोने में भी यदि गुनगुने पानी का प्रयोग किया जाय तो हितकर होगा।
शरीर की चंपी करवाना एवं यदि कुश्ती अथवा अन्य कसरतें आती हों तो उन्हें करना हितावह है।
तेल मालिश के बाद शरीर पर उबटन लगाकर स्नान करना हितकारी होता है।
कमरे एवं शरीर को थोड़ा गर्म रखें। सूती, मोटे तथा ऊनी वस्त्र इस मौसम में लाभकारी होते हैं।
प्रातःकाल सूर्य की किरणों का सेवन करें। पैर ठंडे न हों इस हेतु जूते पहनें। बिस्तर, कुर्सी अथवा बैठने के स्थान पर कम्बल, चटाई, प्लास्टिक अथवा टाट की बोरी बिछाकर ही बैठें। सूती कपड़े पर न बैठें।
स्कूटर जैसे दुपहिया खुले वाहनों द्वारा इन दिनों लम्बा सफर न करते हुए बस, रेल, कार-जैसे वाहनों से ही सफर करने का प्रयास करें।
दशमूलारिष्ट, लोहासन, अश्वगंधारिष्ट, च्यवनप्राश अथवा अश्वगंधावलेह जैसी देशी व आयुर्वेदिक औषधियों का इस काल में सेवन करने से वर्ष भर के लिए पर्याप्त शक्ति का संचय किया जा सकता है।
हेमंत ऋतु में बड़ी हरड़ का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण समभाग मिलाकर और शिशिर ऋतु में बड़ी हरड़ का चूर्ण समभाग पीपर (पिप्पली या पीपल) चूर्ण के साथ प्रातः सूर्योदय के समय अवश्य पानी में घोलकर पी जायें। दोनों मिलाकर 5 ग्राम लेना पर्याप्त है। इसे पानी में घोलकर पी जायें। यह उत्तम रसायन है। लहसुन की 3-4 कलियाँ या तो ऐसे ही निगल जाया करें या चबाकर खा लें या दूध में उबालकर खा लिया करें।

जो सम्पन्न और समर्थ हों, वे इस मौसम में केसर, चंदन और अगर घिसकर शरीर पर लेप करें।
गरिष्ठ खाद्य पदार्थों के सेवन से पहले अदरक के टुकड़ों पर नमक व नींबू का रस डालकर खाने से जठराग्नि अधिक प्रबल होती है।
भोजन पचाने के लिए भोजन के बाद निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ बायाँ हाथ पेट पर दक्षिणावर्त (दक्षिण दिशा की ओर घुमाव देते हुए) घुमा लेना चाहिए, जिससे भोजन शीघ्रता से पच सके।
अगस्त्यं कुंभकर्णच शनिं च बडवानलम्।
आहारपरिपाकार्थ स्मरेद भीमं च पंचमम्।।
 
इस ऋतु में सर्दी, खाँसी, जुकाम या कभी बुखार की संभावना भी बनी रहती है। ऐसा होने पर निम्निलिखित उपाय करने चाहिए।
सर्दी-जुकाम एवं खाँसी मिटाने के उपायः सुबह तथा रात्रि को सोते वक्त हल्दी-नमकवाले ताजे भुने हुए एक मुट्ठी चने खायें, किंतु खाने के बाद कोई भी पेय पदार्थ, यहाँ तक कि पानी न पियें। भोजन में घी, दूध, शक्कर, गुड़ एवं खटाई तथा फलों का सेवन बन्द कर दें। सर्दी-खाँसी वाले स्थायी मरीजों के लिए यह सस्ता प्रयोग है।
भोजन के पश्चात हल्दी-नमकवाली भुनी हुई अजवायन को मुखवास के रुप में नित्य सेवन करने से सर्दी-खाँसी मिट जाती है। अजवाइन का धुआँ लेना चाहिए। अजवाइन की पोटली से छाती की सेंक करनी चाहिए। मिठाई, खटाई एवं चिकनाईयुक्त चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
प्रतिदिन मुखवास के रूप में दालचीनी का प्रयोग करें। दो ग्राम सोंठ, आधा ग्राम दालचीनी तथा 5 ग्राम पुराना गुड़ – इन तीनों को कटोरी में गरम करके रोज ताजा खाने से सर्दी मिटती है।
सर्दी-जुकाम अधिक होने पर नाक बंद हो जाती है, सिर भी भारी हो जाता है और बहुत बेचैनी होती है। ऐसे समय में एक तपेली में पानी को खूब गरम करके उसमें थोड़ा दर्दशामक मलहम, नीलगिरि का तेल अथवा कपूर डालकर सिर व तपेली ढँक जाय ऐसा कोई मोटा कपड़ा या तौलिया ओढ़कर गरम पानी  की भाप लें। ऐसा करने से कुछ ही मिनटों में लाभ होगा एवं सर्दी से राहत मिलेगी।
मिश्री के बारीक चूर्ण को नसवार की तरह नाक से सूँघें।
स्थायी सर्दी-जुकाम एवं खाँसी के रोगी को 2 ग्राम सोंठ, 10 से 12 ग्राम गुड़ एवं थोड़ा घी एक कटोरी में लेकर उतनी देर तक गर्म करना चाहिए जब तक कि गुड़ पिघल न जाय। फिर सबको मिलाकर सुबह खाली पेट रोज गरम-गरम खा ले। भोजन में मीठी, खट्टी, चिकनी एवं गरिष्ठ वस्तुएँ न ले। रोज सादे पानी की जगह पर सोंठ की डली डालकर उबाला गया पानी ही गुनगुना-गर्म हो जाय तब पियें। इस प्रयोग से रोग मिट जायेगा।
सर्दी के कारण होता सिरदर्द, छाती का दर्द एवं बेचैनी में सोंठ का चूर्ण पानी में डालकर गर्म करके पीड़ावाले स्थान पर थोड़ा लेप करें। सोंठ की डली डालकर उबाला गया पानी पियें। सोंठ का चूर्ण शहद में मिलाकर थोड़ा-थोड़ा रोज चाटें। मूँग, बाजरी, मेथी एवं लहसुन का प्रयोग भोजन में करें। इससे भी सर्दी मिटती है।
हल्दी को अंगारों पर डालकर उससी धूनी लें तथा हल्दी के चूर्ण को दूध में डालकर पियें। इससे लाभ होता है।


वायु की सूखी खाँसी में अथवा पित्तजन्य खाँसी में, खून गिरने में, छाती की कमजोरी के दर्द में, मानसिक दुर्बलता में तथा नपुंसकता के रोग में गेहूँ के आटे में गुड़ अथवा शक्कर एवं घी डालकर बनाया गया हलुआ विशेष हितकर है। वायु की खाँसी में गुड़ के हलुए में सोंठ डालें। खून गिरने के रोग में मिश्री-घी में हलुआ बनाकर किशमिश डालें। मानसिक दौर्बल्य में उपयोग करने के लिए हलुए में बादाम डालें। कफजन्य खाँसी तथा श्वास के दर्द में गुनगुने पानी के साथ अजवाइन खिलाने से लाभ होता है, कफोत्पत्ति बंद होती है। पीपरामूल, सोंठ एवं बहेड़ादल का चूर्ण बनाकर शहद में मिलाकर प्रतिदिन खाने से सर्दी कफ की खाँसी मिटती है।

शरद ऋतुचर्या

भाद्रपद एवं आश्विन ये शरद ऋतु के दो महीने हैं। शरद ऋतु स्वच्छता के बारे में सावधान रहने की ऋतु है अर्थात् इस मौसम में स्वच्छता रखने की खास जरूरत है। रोगाणाम् शारदी माताः। अर्थात् शरद ऋतु रोगों की माता है।
शरद ऋतु में स्वाभाविक रूप से ही पित्तप्रकोप होता है। इससे इन दो महीनों में ऐसा ही आहार एवं औषधी लेनी चाहिए जो पित्त का शमन करे। मध्याह्न के समय पित्त बढ़ता है। तीखे नमकीन, खट्टे, गरम एवं दाह उत्पन्न करने वाले द्रव्यों का सेवन, मद्यपान, क्रोध अथवा भय, धूप में घूमना, रात्रि-जागरण एवं अधिक उपवास – इनसे पित्त बढ़ता है। दही, खट्टी छाछ, इमली, टमाटर, नींबू, कच्चे आम, मिर्ची, लहसुन, राई, खमीर लाकर बनाये गये व्यंजन एवं उड़द जैसी चीजें भी पित्त की वृद्धि करती हैं।
इस ऋतु में पित्तदोष की शांति के लिए ही शास्त्रकारों द्वारा खीर खाने, घी का हलवा खाने तथा श्राद्धकर्म करने का आयोजन किया गया है। इसी उद्देश्य से चन्द्रविहार, गरबा नृत्य तथा शरद पूर्णिमा के उत्सव के आयोजन का विधान है। गुड़ एवं घूघरी (उबाली हुई ज्वार-बाजरा आदि) के सेवन से तथा निर्मल, स्वच्छ वस्त्र पहन कर फूल, कपूर, चंदन द्वारा पूजन करने से मन प्रफुल्लित एवं शांत होकर पित्तदोष के शमन में सहायता मिलती है।
 
इस ऋतु में पित्त का प्रकोप होकर जो बुखार आता है, उसमें एकाध उपवास रखकर नागरमोथ, पित्तपापड़ा, चंदन, वाला (खस) एवं सोंठ डालकर उबालकर ठंडा किया हुआ पानी पीना चाहिए। पैरों में घी घिसना चाहिए। बुखार उतरने के बाद सावधानीपूर्वक ऊपर की ही औषधियों में गिलोय, काली द्राक्ष एवं त्रिफला मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर पीना चाहिए।
व्यर्थ जल्दबाजी के कारण बुखार उतारने की अंग्रजी दवाओं का सेवन न करें अन्यथा पीलिया, यकृतदोष (लीवर की सूजन), आँव, लकवा, टायफाइड, जहरी मलेरिया, पेशाब एवं दस्त में रक्त गिरना, शीतपित्त जैसे नये-नये रोग होते ही रहेंगे। आजकल कई लोगों का ऐसा अनुभव है। अतः अंग्रेजी दवाओं से सदैव सावधान रहें।
सावधानियाँ-
श्राद्ध के दिनों में 16 दिन तक दूध, चावल, खीर का सेवन पित्तशामक है। परवल, मूँग, पका पीला पेठा (कद्दू) आदि का भी सेवन कर सकते हैं।
दूध के विरुद्ध पड़ने वाले आहार जैसे की सभी प्रकार की खटाई, अदरक, नमक, मांसाहार आदि का त्याग करें। दही, छाछ, भिंडी, ककड़ी आदि अम्लविपाकी (पचने पर खटास उत्पन्न करने वाली) चीजों का सेवन न करें।
कड़वा रस पित्तशामक एवं ज्वर प्रतिरोधी है। अतः कटुकी, चिरायता, नीम की अंतरछाल, गुडुच, करेले, सुदर्शन चूर्ण, इन्द्रजौ (कुटज) आदि के सेवन हितावह है।
धूप में न घूमें। श्राद्ध के दिनों में एवं नवरात्रि में पितृपूजन हेतु संयमी रहना चाहिए। कड़क ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। यौवन सुरक्षा पुस्तक का पाठ करने से ब्रह्मचर्य में मदद मिलेगी।
इन दिनों में रात्रिजागरण, रात्रिभ्रमण अच्छा होता है इसीलिए नवरात्रि आदि का आयोजन किया जाता है। रात्रिजागरण 12 बजे तक का ही माना जाता है। अधिक जागरण से और सुबह एवं दोपहर को सोने से त्रिदोष प्रकुपित होते हैं जिससे स्वास्थ्य बिगड़ता है।

हमारे दूरदर्शी ऋषि-मुनियों ने शरद पूनम जैसा त्यौहार भी इस ऋतु में विशेषकर स्वास्थ्य की दृष्टि से ही आयोजित किया है। शरद पूनम के दिन रात्रिजागरण, रात्रिभ्रमण, मनोरंजन आदि का उत्तम पित्तनाशक विहार के रूप में आयुर्वेद ने स्वीकार किया है।
 
शरदपूनम की शीतल रात्रि छत पर चन्द्रमा की किरणों में रखी हुई दूध-पोहे अथवा दूध-चावल की खीर सर्वप्रिय, पित्तशामक, शीतल एवं सात्त्विक आहार है। इस रात्रि में ध्यान, भजन, सत्संग, कीर्तन, चन्द्रदर्शन आदि शारीरिक व मानसिक आरोग्यता के लिए अत्यंत लाभदायक है।
इस ऋतु में भरपेट भोजन दिन की निद्रा, बर्फ, ओस, तेल व तले हुए पदार्थों का सेवन न करें।

वसंत ऋतुचर्या


 
वसंत ऋतु की महिमा के विषय में कवियों ने खूब लिखा है
गुजराती कवि दलपतराम ने कहा हैः
रूडो जुओ आ ऋतुराज आव्यो। मुकाम तेणे वनमां जमाव्यो।।
अर्थात्
देखो, सुंदर यह ऋतुराज आया। आवास उसने वन को बनाया।।
वसंत का असली आनंद जब वन में से गुजरते हैं तब उठाया जा सकता है। रंग-बिरंगे पुष्पों से आच्छादित वृक्ष..... शीतल एवं मंद-मंद बहती वायु..... प्रकृति मानों, पूरी बहार में होती है। ऐसे में सहज ही प्रभु का स्मरण हो आता है, सहज ही में ध्यानावस्था में पहुँचा जा सकता है।
ऐसी सुंदर वसंत ऋतु में आयुर्वेद ने खान-पान में संयम की बात कहकर व्यक्ति एवं समाज की नीरोगता का ध्यान रखा है।
जिस प्रकार पानी अग्नि को बुझा देता है वैसे ही वसंत ऋतु में पिघला हुआ कफ जठराग्नि को मंद कर देता है। इसीलिए इस ऋतु में लाई, भूने हुए चने, ताजी हल्दी, ताजी मूली, अदरक, पुरानी जौ, पुराने गेहूँ की चीजें खाने के लिए कहा गया है। इसके अलावा मूँग बनाकर खाना भी उत्तम है। नागरमोथ अथवा सोंठ डालकर उबाला हुआ पानी पीने से कफ का नाश होता है। देखो, आयुर्वेद विज्ञान की दृष्टि कितनी सूक्ष्म है !
मन को प्रसन्न करें एवं हृदय के लिए हितकारी हों ऐसे आसव, अरिष्ट जैसे कि मध्वारिष्ट, द्राक्षारिष्ट, गन्ने का रस, सिरका आदि पीना इस ऋतु में लाभदायक है।
 
वसंत ऋतु में आने वाला होली का त्यौहार इस ओर संकेत करता है कि शरीर को थोड़ा सूखा सेंक देना चाहिए जिससे कफ पिघलकर बाहर निकल जाय। सुबह जल्दी उठकर थोड़ा व्यायाम करना, दौड़ना अथवा गुलाटियाँ खाने का अभ्यास लाभदायक होता है।
मालिश करके सूखे द्रव्य आँवले, त्रिफला अथवा चने के आटे आदि का उबटन लगाकर गर्म पानी से स्नान करना हितकर है। आसन, प्राणायाम एवं टंक विद्या की मुद्रा विशेष रूप से करनी चाहिए।
दिन में सोना नहीं चाहिए। दिन में सोने से कफ कुपित होता है। जिन्हें रात्रि में जागना आवश्यक हो वे थोड़ा सोयें तो ठीक है। इस ऋतु में रात्रि-जागरण भी नहीं करना चाहिए।
वसंत ऋतु में सुबह खाली पेट हरड़े का चूर्ण शहद के साथ सेवन करने से लाभ होता है। इस ऋतु में कड़वे नीम में नयी कोंपलें फूटती हैं। नीम की 15-20 कोंपलें 2-3 काली मिर्च के साथ चबा-चबाकर खानी चाहिए। 15-20 दिन यह प्रयोग करने से वर्षभर चर्मरोग, रक्तविकार और ज्वर आदि रोगों से रक्षा करने की प्रतिरोधक शक्ति पैदा होती है एवं आरोग्यता की रक्षा होती है। इसके अलावा कड़वे नीम के फूलों का रस 7 से 15 दिन तक पीने से त्वचा के रोग एवं मलेरिया जैसे ज्वर से भी बचाव होता है।
मधुर रसवाले पौष्टिक पदार्थ एवं खट्टे-मीठे रसवाले फल आदि पदार्थ जो कि शीत ऋतु में खाये जाते हैं, उन्हें खाना बंद कर देना चाहिए क्योंकि वे कफ को बढ़ाते हैं। वसंत ऋतु के कारण स्वाभाविक ही पाचनशक्ति कम हो जाती है, अतः पचने में भारी पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। ठंडे पेय, आइसक्रीम, बर्फ के गोले चॉकलेट, मैदे की चीजें, खमीरवाली चीजें, दही आदि पदार्थ बिल्कुल त्याग देने चाहिए।
 
धार्मिक ग्रंथों के वर्णनानुसार चैत्र मास के दौरान 'अलौने व्रत' (बिना नमक के व्रत) करने से रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है एवं त्वचा के रोग, हृदय के रोग, उच्च रक्तचाप (हाई बी.पी.), गुर्दा (किडनी) आदि के रोग नहीं होते।

यदि कफ ज्यादा हो तो रोग होने से पूर्व ही 'वमन कर्म' द्वारा कफ को निकाल देना चाहिए किंतु वमन कर्म किसी योग्य वैद्य की निगरानी में करना ही हितावह है। सामान्य उलटी करनी हो आश्रम से प्रकाशित योगासन पुस्तक में बतायी गयी विधि के अनुसार गजकरणी की जा सकती है। इससे अनेक रोगों से बचाव होता है।