Sunday, 20 September 2015

ईसबगोल

परिचय :

ईसबगोल की व्यवसायिक रूप से खेती उत्तरी गुजरात के मेहसाना और बनासकाठा जिलों में होती है। वैसे ईसबगोल की खेती उ.प्र, पंजाब, हरियाणा प्रदेशों में भी की जाती है। ईसबगोल का पौधा तनारहित, मौसमी, झाड़ीनुमा होता है। ईसबगोल की ऊंचाई लगभग 10 से 30 सेमी होती है। ईसबगोल के पत्ते 9 से 27 सेमी तक लम्बे होते हैं। इसका फूल गेहूं की बालियों के समान होता है। जिस पर ये छोटे-2, लम्बे, गोल, अण्डाकार मंजरियों में से निकलते हैं। फूलों में नाव के आकार के बीज लगते हैं। बीजों से लगभग 26-27 प्रतिशत भूसी निकलती है। भूसी पानी के संपर्क में आते ही चिकना लुबाव बना लेती है जो बिना स्वाद और गंध का होता है। औषधि रूप में ईसबगोल बीज और उसकी भूसी का उपयोग करते हैं।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
हिन्दी ईसबगोल
संस्कृत ईषढ़गोल
मराठी ईसबगोल
गुजराती उथमुजीरू
बंगाली इसपूबगल
अंग्रेजी स्पोगल सीड्स
लैटिन प्लैण्टेगो ओवाटा
रंग : ईसबगोल का रंग लाल सफेदी लिए हुए होता है।
स्वाद : इसका स्वाद तीखा और कड़वा होता है।
स्वभाव : ईसबगोल का स्वभाव शीतल होता है।
हानिकारक : इसका अधिक मात्रा में सेवन करने से >भूख कम लगती है।
सावधानी : ईसबगोल का अधिक मात्रा में सेवन करने से कब्ज का रोग हो जाता है। जठराग्नि का मंद (भोजन पचाने की क्रिया का कम होना) होना भी सम्भव है। इसके सेवन के समय प्रचुर मात्रा में पेय पदार्थों का सेवन करें। गर्भवती औरतों को इसका सेवन सावधानी से करना चाहिए। ईसबगोल के बीजों या भूसी को 1 कप पानी में घोलकर इसे खूब हिलाकर पीना चाहिए। बीजों और भूसी को एक कप पानी में डालकर लगभग 2 घंटे तक भिगों दें, जब पूरा लुवाब बन जाए तब इसे चीनी या मिश्री मिलाकर खाने से लाभ होता है।
दोषों को दूर करने वाला : शहद ईसबगोल के गुणों को सुरक्षित रखता है एवं इसमें व्याप्त दोषों को दूर करता है।
तुलना : इसकी तुलना विहीदाना से की जा सकती है।
मात्रा : ईसबगोल की मात्रा 6 ग्राम से लेकर 9 ग्राम तक दिन में 2 बार ज्यादा से ज्यादा 20 ग्राम तक लेना चाहिए।

गुण : ईसबगोल गर्मी, प्यास, गर्मी के बुखार, कण्ठ (गला), हृदय (दिल) और जीभ की खरखराहट तथा खून के रोगों को दूर करता है। यह आंतों के घाव, आंव और मरोड़ में लाभदायक होता है। ईसबगोल को भूनकर खाने से यह मल को रोकता है। ईसबगोल के लुबाब से कुल्ले करने से मुंह के दाने को दूर करते हैं। ईसबगोल को पीसकर लेप करने से यह गर्मी से हुई सूजन को दूर करता है। परन्तु कूट देने से यह विषाक्त हो जाता है। यह बहुत ही पुष्टकारक होता है। यह कुछ रक्त-कारक और पित्त-नाशक होता है।

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